Saturday, 24 September 2016

"तुम शब्द बन कर आ गये"

तुम्हे ही तो लिख रही थी
कि तुम शब्द बन कर आ गये,
शान्त स्निग्ध नयनों से,
अविराम दृष्टि गड़ाये हुए ,
अक्षरों की ओट से निहारते,
मन के पुलिन तट पर ,
असंख्य स्पन्दित कामनायें,
उल्लसित हो प्रदीप्त हो उठी,
तुम्हे ही तो  पढ रही थी,
कि तुम अर्थ बन कर आ गये,
मंद मुदित स्मर स्मिति  से,
स्वप्निल  स्पृहा बिछाये हुए,
पुस्तक की ओट से निहारते,
जीवन के सुमधुर पल पर ,
कम्पित नादमय संगीत जो ,
बनकर सारंगा सी झूम उठी||
…निधि …

"कभी शाम को सिसकते सुना है"

कभी शाम को सिसकते सुना है ,
उदासी में बैठी विरहनी की तरह,
जब काजल आँसुओं में बह कर ,
क्षितिज में स्याह सी फैल जाती है ,
गीत विरह के गुनगुनाती,पुकारती ,
दिन भर के सफ़र से थकी हुई ,
मोरनी सी ऋंगार कर ,थिरकती ,
बाट जोहती और खो जाती रात में.
मैने शाम को उदास बैठे देखा है ,
उसे सुना है सिसकते हुए ,
देखा है मैने उसे आँसू बहाते,
और विरह  वेदना में ,पुकारते -
पुकारते ,देखा है उसे खो जाते,
नि:शब्द, गहन  और निष्ठुर रात  में.
…निधि …