Saturday, 24 September 2016

"कभी शाम को सिसकते सुना है"

कभी शाम को सिसकते सुना है ,
उदासी में बैठी विरहनी की तरह,
जब काजल आँसुओं में बह कर ,
क्षितिज में स्याह सी फैल जाती है ,
गीत विरह के गुनगुनाती,पुकारती ,
दिन भर के सफ़र से थकी हुई ,
मोरनी सी ऋंगार कर ,थिरकती ,
बाट जोहती और खो जाती रात में.
मैने शाम को उदास बैठे देखा है ,
उसे सुना है सिसकते हुए ,
देखा है मैने उसे आँसू बहाते,
और विरह  वेदना में ,पुकारते -
पुकारते ,देखा है उसे खो जाते,
नि:शब्द, गहन  और निष्ठुर रात  में.
…निधि …

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